Saturday, 28 April 2018

सोच

माँ बहनों की लुट रही आबरू पर  मेरे कुछ शब्द मेरी कलम से📝📝📝
✒️✒️✒️एक दिन टीवी में सुन रहा था समाचार।
सुनते सुनते मन में आया एक विचार।
खबर ये सच्ची है या है एक कल्पनाचार ।
है कल्पनाचार या टी आर पी का है व्यापार ।

सजा था मंच बहस का नेता बैठे थे तईयार ।
पास में बैठी थी एक नारी वेबस सी लाचार ।
ढक रखा था सूरत को जैसे हो वो गुनेहगार ।
समाचार उदघोषक ने चिल्लाया मुद्दा है ये बलात्कार।

चिल्ला चिल्लाकर उदघोषक ने प्रश्न पर प्रश्न दागे।
हक्का बक्का थे नेता सब हर सवाल के आंगे।
सुन जवाब नेताओं के तो शर्म भी मुंह छिपाकर भागे ।
कैसे माँ-बहन की इज़्ज़त बेंच रहे राजनीति के आंगे।

न्यूज वालों ने भी कुछ  ऐसी तरकीब बिछाई थी।
पढ़कर हेडलाइन तो मेरी आँख ही भर आई थी।
नारी की इज़्ज़त की भी यहाँ अलग जात बनाई थी।
हिंदू मुस्लिम दलित हर बेटी की अलग दुहाई थी ।

पीड़ित नारी की न सुन रहा था वहाँ कोई पुकार ।
सज़ा रहे थे सब अपने अपने स्वारथ का बाजार ।
झुंझलाए मन का न्यूज़ बदलना भी लगा था बेकार ।
जहाँ भी देखा गरमाया था ओछेपन का दरबार ।

शीर्ष पदों पर नेत्री बैठीं ऐसे चुप्पी साधे थीं ।
जैसे पद लोलुपता में नारी की ही इज़्ज़त फाँके थीं ।
होकर नारी एक बेबस नारी को ही छेड़ रहीं थीं ।
 राजनीति के घृणित शास्त्र में लगता जैसे पारंगत थीं ।

देख नज़ारा टीवी पर अन्तर्मन मेरा डोल गया ।
त्रेता का रावन अच्छा था न जाने क्यों बोल गया ।
दानव होकर भी जो मानवता के पट खोल गया ।
जैसे वह नारी इज़्ज़त की परिभाषा ही छोड़ गया ।

 निर्मम मौत मिले दरिंदों को तब होगा भारत का उद्धार ।
अबला तुम बनकर दुर्गा करो धरा से दुष्टों का संहार ।
राजनीति का खेल ये गन्दा छोड़े अब हर सरकार ।
बेटों को भी बेटी जैसी संस्कारिता सिखलाये हर परिवार ।

।।।।📝📝📝📝
      🙏👤  जीतेन्द्र प्रताप सिंह (जेपी)
     ✒️✒️✒️✒️✒️✒️✒️

Saturday, 7 April 2018

📝 शिक्षकों के लिये 📝

📋 जैसा कि हम सभी अध्यापक जानते हैं कि नया शैक्षिक सत्र 2018-2019 प्रारम्भ हो चुका है । हम चारों तरफ देखें तो बेसिक शिक्षा की दिशा और दशा बदली हुई नजर आ रही है और इस पुनीत कार्य में मिशन शिक्षण संवाद के सहयोग की जितनी तारीफ की जाये कम है ।
इसी क्रम में मैं अपनी कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ .......🔅🔅
🏷✒
       🏮शिक्षकों के लिए🏮

🔅चलो करते हैं आगाज़ कुछ ऐसा,
    कि अमिट छाप बन जाये ।

🔅मंजिल की राहें भी न रुषवा हों ,
   और ज्ञान की ये महफ़िल भी संवर जाये ।

🔅 बेशक़ मंजिल के  रास्ते कठिन होंगे ,
  पर चल पड़ें हम तो लीक बन जाये ।

🔅 दें तालीम इन परिंदों को ऐसी ,
  कि छू लें बुलंदी और इतिहास बन जाये ।

🔅 बड़े नाजुक हैं पर इनके अभी,
  जरा देखना इन्हें कोई टूट न जाये ।
🔅लगता है माजी सोया है इनका वर्षों से,
   जगा दें तकदीर तो इनका मुस्तक़बिल ही संवर जाये ।

🔅 गुरुओं को तो ये खुदा मानते हैं,
  सम्भलना कहीं ये एतवार न टूट जाये ।

🔅गुरु -शिष्य का रिश्ता सबसे अलग होता है संसार में,
 करना जतन कोई, कंही ये पहचान न खो जाये ।

🔅 आईना जमाने का है हमारे हाथों में,
रहना सज़ग कहीं तस्वीर न धूमिल बन जाये ।

🔅 मालूम है 'जेपी' को ये दुनिया बहुत बड़ी है ,
  सारी  दुनिया न सही कुछ महकमा तो बदल जाये ।
🙏🏻🙏🏻
आइये नई ऊर्जा और नये विचारों के साथ नवनिहालों का भविष्य संवारने के लिए संकल्प लें और बेसिक शिक्षा की तस्वीर बदल दें ।🙏🏻🙏🏻


🖋 जीतेंद्र प्रताप सिंह(जेपी)
  स0अ0,   पू0मा0वि0 महेरा, मुस्करा, हमीरपुर (उ0प्र0)