माँ बहनों की लुट रही आबरू पर मेरे कुछ शब्द मेरी कलम से📝📝📝
✒️✒️✒️एक दिन टीवी में सुन रहा था समाचार।
सुनते सुनते मन में आया एक विचार।
खबर ये सच्ची है या है एक कल्पनाचार ।
है कल्पनाचार या टी आर पी का है व्यापार ।
सजा था मंच बहस का नेता बैठे थे तईयार ।
पास में बैठी थी एक नारी वेबस सी लाचार ।
ढक रखा था सूरत को जैसे हो वो गुनेहगार ।
समाचार उदघोषक ने चिल्लाया मुद्दा है ये बलात्कार।
चिल्ला चिल्लाकर उदघोषक ने प्रश्न पर प्रश्न दागे।
हक्का बक्का थे नेता सब हर सवाल के आंगे।
सुन जवाब नेताओं के तो शर्म भी मुंह छिपाकर भागे ।
कैसे माँ-बहन की इज़्ज़त बेंच रहे राजनीति के आंगे।
न्यूज वालों ने भी कुछ ऐसी तरकीब बिछाई थी।
पढ़कर हेडलाइन तो मेरी आँख ही भर आई थी।
नारी की इज़्ज़त की भी यहाँ अलग जात बनाई थी।
हिंदू मुस्लिम दलित हर बेटी की अलग दुहाई थी ।
पीड़ित नारी की न सुन रहा था वहाँ कोई पुकार ।
सज़ा रहे थे सब अपने अपने स्वारथ का बाजार ।
झुंझलाए मन का न्यूज़ बदलना भी लगा था बेकार ।
जहाँ भी देखा गरमाया था ओछेपन का दरबार ।
शीर्ष पदों पर नेत्री बैठीं ऐसे चुप्पी साधे थीं ।
जैसे पद लोलुपता में नारी की ही इज़्ज़त फाँके थीं ।
होकर नारी एक बेबस नारी को ही छेड़ रहीं थीं ।
राजनीति के घृणित शास्त्र में लगता जैसे पारंगत थीं ।
देख नज़ारा टीवी पर अन्तर्मन मेरा डोल गया ।
त्रेता का रावन अच्छा था न जाने क्यों बोल गया ।
दानव होकर भी जो मानवता के पट खोल गया ।
जैसे वह नारी इज़्ज़त की परिभाषा ही छोड़ गया ।
निर्मम मौत मिले दरिंदों को तब होगा भारत का उद्धार ।
अबला तुम बनकर दुर्गा करो धरा से दुष्टों का संहार ।
राजनीति का खेल ये गन्दा छोड़े अब हर सरकार ।
बेटों को भी बेटी जैसी संस्कारिता सिखलाये हर परिवार ।
।।।।📝📝📝📝
🙏👤 जीतेन्द्र प्रताप सिंह (जेपी)
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✒️✒️✒️एक दिन टीवी में सुन रहा था समाचार।
सुनते सुनते मन में आया एक विचार।
खबर ये सच्ची है या है एक कल्पनाचार ।
है कल्पनाचार या टी आर पी का है व्यापार ।
सजा था मंच बहस का नेता बैठे थे तईयार ।
पास में बैठी थी एक नारी वेबस सी लाचार ।
ढक रखा था सूरत को जैसे हो वो गुनेहगार ।
समाचार उदघोषक ने चिल्लाया मुद्दा है ये बलात्कार।
चिल्ला चिल्लाकर उदघोषक ने प्रश्न पर प्रश्न दागे।
हक्का बक्का थे नेता सब हर सवाल के आंगे।
सुन जवाब नेताओं के तो शर्म भी मुंह छिपाकर भागे ।
कैसे माँ-बहन की इज़्ज़त बेंच रहे राजनीति के आंगे।
न्यूज वालों ने भी कुछ ऐसी तरकीब बिछाई थी।
पढ़कर हेडलाइन तो मेरी आँख ही भर आई थी।
नारी की इज़्ज़त की भी यहाँ अलग जात बनाई थी।
हिंदू मुस्लिम दलित हर बेटी की अलग दुहाई थी ।
पीड़ित नारी की न सुन रहा था वहाँ कोई पुकार ।
सज़ा रहे थे सब अपने अपने स्वारथ का बाजार ।
झुंझलाए मन का न्यूज़ बदलना भी लगा था बेकार ।
जहाँ भी देखा गरमाया था ओछेपन का दरबार ।
शीर्ष पदों पर नेत्री बैठीं ऐसे चुप्पी साधे थीं ।
जैसे पद लोलुपता में नारी की ही इज़्ज़त फाँके थीं ।
होकर नारी एक बेबस नारी को ही छेड़ रहीं थीं ।
राजनीति के घृणित शास्त्र में लगता जैसे पारंगत थीं ।
देख नज़ारा टीवी पर अन्तर्मन मेरा डोल गया ।
त्रेता का रावन अच्छा था न जाने क्यों बोल गया ।
दानव होकर भी जो मानवता के पट खोल गया ।
जैसे वह नारी इज़्ज़त की परिभाषा ही छोड़ गया ।
निर्मम मौत मिले दरिंदों को तब होगा भारत का उद्धार ।
अबला तुम बनकर दुर्गा करो धरा से दुष्टों का संहार ।
राजनीति का खेल ये गन्दा छोड़े अब हर सरकार ।
बेटों को भी बेटी जैसी संस्कारिता सिखलाये हर परिवार ।
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🙏👤 जीतेन्द्र प्रताप सिंह (जेपी)
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